जैव विविधता: अर्थ, महत्व, ह्रास और संरक्षण की आवश्यकता

जैव विविधता: अर्थ, महत्व, ह्रास और संरक्षण की आवश्यकता


जैव विविधता क्या है?

जैव विविधता से आशय पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी जीवित रूपों की विविधता से है, जिसमें पौधे, जानवर, सूक्ष्मजीव, उनकी आनुवंशिक भिन्नताएँ तथा उनके द्वारा निर्मित विभिन्न पारिस्थितिकी तंत्र शामिल होते हैं।  यह केवल प्रजातियों की संख्या नहीं दर्शाती, बल्कि जीवों के बीच सहजीवन और पारिस्थितिक प्रक्रियाओं का संतुलन भी व्यक्त करती है। जैव विविधता पृथ्वी पर जीवन का आधार है और मानव समाज के अस्तित्व के लिए अनिवार्य है।

जैव विविधता का महत्व

पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन

  • विविध प्रजातियाँ मिलकर जल शुद्धिकरण, मृदा उर्वरता, पोषक तत्व चक्रण और परागण जैसी सेवाएँ प्रदान करती हैं।
  • जैव विविधता के बिना ये पारिस्थितिकी सेवाएँ कमजोर हो जाती हैं, जिससे मानव जीवन और आजीविका पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

मानव स्वास्थ्य के लिए जरूरी

  • स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र रोगजनकों को नियंत्रित रखता है।
  • जैव विविधता हानि से जूनोटिक रोगों का फैलाव बढ़ता है, जैसा हाल की वैश्विक महामारियों में देखा गया।

जलवायु परिवर्तन से लड़ने में योगदान

  • वन, आर्द्रभूमि और मैंग्रोव जैसे पारिस्थितिकी तंत्र कार्बन सिंक का काम करते हैं।
  • ये वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करके जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करते हैं।

आर्थिक विकास और आजीविका का स्रोत

  • कृषि, मत्स्य पालन, वानिकी और पारिस्थितिक पर्यटन जैव विविधता पर निर्भर हैं।
  • विशेषकर विकासशील देशों में प्राकृतिक संसाधनों से लोगों की आजीविका जुड़ी होती है।

संस्कृति, परंपरा और पहचान में योगदान

  • अनेक पौधे और जानवर धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक परंपरा और राष्ट्रीय प्रतीक से जुड़े हैं।
  • जैव विविधता कला, साहित्य और शिक्षा को प्रेरणा देती है।
  • मूलनिवासी समुदायों का प्रकृति से आध्यात्मिक संबंध संरक्षण प्रयासों में अहम माना जाता है।

जैव विविधता का ह्रास: कारण और प्रभाव

ह्रास का वैश्विक परिदृश्य

  • वर्तमान समय को अक्सर छठे सामूहिक विलुप्ति काल कहा जाता है।
  • पौधों, जानवरों और सूक्ष्मजीवों की प्रजातियाँ अभूतपूर्व गति से विलुप्त हो रही हैं।
  • अतीत में विलुप्तियाँ प्राकृतिक कारणों से होती थीं, जबकि आज मानव गतिविधियाँ—जैसे अति-उपयोग, जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण—मुख्य कारण हैं।

प्रमुख कारण

आवास विनाश और विखंडन

  • वनों की कटाई, शहरीकरण और औद्योगीकरण से प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहे हैं।
  • सड़कों और बस्तियों के निर्माण से आवास खंडित हो जाते हैं, जिससे अनेक प्रजातियाँ संकट में पड़ती हैं।

प्राकृतिक संसाधनों का अति-शोषण

  • अत्यधिक शिकार, अवैध वन्यजीव व्यापार और अनियंत्रित मत्स्य पालन से कई प्रजातियाँ विलुप्ति के कगार पर हैं।

आक्रामक विदेशी प्रजातियाँ

  • गैर-देशी प्रजातियाँ स्थानीय प्रजातियों के संसाधनों पर प्रतिस्पर्धा बढ़ाती हैं।
  • इससे देशी प्रजातियाँ कमजोर होती हैं और कई बार विलुप्त हो जाती हैं।

सह-विलुप्ति की प्रक्रिया

  • जब कोई प्रजाति विलुप्त होती है, तो उस पर निर्भर अन्य प्रजातियाँ भी अवशोषित हो सकती हैं
  • यह जैव विविधता हानि को और तीव्र बनाता है।

निष्कर्ष: संरक्षण की अनिवार्यता

जैव विविधता केवल प्रकृति की संपदा नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और जीवन की सुरक्षा का आधार है।
वर्तमान समय में इसके ह्रास को रोकना सभी के लिए जिम्मेदारी है।
संरक्षण के उपाय: प्राकृतिक आवासों की सुरक्षा, अति-शोषण पर नियंत्रण, विदेशी प्रजातियों का प्रबंधन और जैव विविधता जागरूकता अभियान।
यदि हम समय रहते संरक्षण नहीं करेंगे, तो इसका प्रभाव सिर्फ प्रकृति तक नहीं, बल्कि मानव समाज तक पहुंचेगा।