
परिचय
- पृथ्वी के वायुमंडल में समताप मंडल (Stratosphere) में स्थित ओजोन परत (O3), सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी (UV) विकिरणों के लिए एक प्राकृतिक ढाल के रूप में कार्य करती है। यह परत पृथ्वी पर जीवन को त्वचा कैंसर, मोतियाबिंद और पारिस्थितिकी तंत्र को होने वाले अन्य गंभीर नुकसानों से बचाती है।
- 1980 के दशक में वैज्ञानिकों ने इस जीवन-रक्षक परत में एक गंभीर क्षरण, जिसे ‘ओजोन छिद्र’ कहा गया, का पता लगाया। इस वैश्विक संकट की प्रतिक्रिया में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने अभूतपूर्व एकता दिखाई, जिसके परिणामस्वरूप मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल का जन्म हुआ। इसी ऐतिहासिक समझौते की स्मृति में प्रतिवर्ष 16 सितंबर को विश्व ओजोन दिवस मनाया जाता है।
वर्तमान संदर्भ
- 16 सितंबर 2025 को विश्व एक बार फिर अंतर्राष्ट्रीय ओजोन परत संरक्षण दिवस मना रहा है। इस वर्ष का आयोजन मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल की स्थायी विरासत और ओजोन परत की पुनर्प्राप्ति में हुई महत्वपूर्ण प्रगति को रेखांकित करता है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की नवीनतम वैज्ञानिक आकलनों से पुष्टि होती है कि यदि वर्तमान नीतियां बनी रहती हैं, तो अंटार्कटिक के ऊपर ओजोन परत के 2066 तक, आर्कटिक के ऊपर 2045 तक और शेष विश्व में 2040 तक 1980 के स्तर पर वापस आने की उम्मीद है। यह उपलब्धि वैश्विक सहयोग की शक्ति का एक ज्वलंत उदाहरण है।
ओजोन क्षरण का विज्ञान और वैश्विक प्रतिक्रिया
- ओजोन (O3) ऑक्सीजन के तीन परमाणुओं से मिलकर बना एक अणु है। समताप मंडल में यह प्राकृतिक रूप से बनता और नष्ट होता रहता है, जिससे एक गतिशील संतुलन बना रहता है। हालांकि, मानव निर्मित रसायनों, जिन्हें ओजोन-क्षयकारी पदार्थ (Ozone-Depleting Substances – ODS) के रूप में जाना जाता है, ने इस संतुलन को बिगाड़ दिया।
- प्रमुख ODS: इनमें क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs), हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन (HCFCs), हैलोन (Halons), और कार्बन टेट्राक्लोराइड शामिल हैं। इनका उपयोग मुख्य रूप से रेफ्रिजरेशन, एयर कंडीशनिंग, फोम निर्माण और एयरोसोल स्प्रे में होता था।
- वियना कन्वेंशन (1985): यह ओजोन परत के संरक्षण के लिए एक रूपरेखा संधि थी। इसने अनुसंधान, निगरानी और सूचना के आदान-प्रदान पर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का आग्रह किया, लेकिन ODS को नियंत्रित करने के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी लक्ष्य निर्धारित नहीं किए।
- मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (1987): वियना कन्वेंशन के तहत अपनाए गए इस प्रोटोकॉल का उद्देश्य ODS के उत्पादन और खपत को एक निर्धारित समय-सीमा के भीतर चरणबद्ध तरीके से समाप्त करना था। यह अब तक की सबसे सफल अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण संधियों में से एक मानी जाती है, जिसे संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देशों द्वारा सार्वभौमिक रूप से अनुमोदित किया गया है।
प्रमुख नीतिगत विशेषताएँ
मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल की सफलता इसकी अनूठी और प्रभावी विशेषताओं में निहित है:
- सार्वभौमिक अनुसमर्थन: यह पहली और एकमात्र संयुक्त राष्ट्र संधि है जिसे दुनिया के हर देश ने अनुमोदित किया है।
- सामान्य लेकिन विभेदित उत्तरदायित्व (CBDR): इसने स्वीकार किया कि विकसित और विकासशील देशों की क्षमताएं और जिम्मेदारियां अलग-अलग हैं। विकासशील देशों को ODS को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के लिए अधिक समय दिया गया।
- बहुपक्षीय कोष (Multilateral Fund): 1991 में स्थापित इस कोष का उद्देश्य विकासशील देशों को प्रोटोकॉल के अनुपालन में वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान करना है।
- वैज्ञानिक और तकनीकी आकलन: प्रोटोकॉल के निर्णय वैज्ञानिक और तकनीकी आकलन पैनलों द्वारा प्रदान किए गए नवीनतम आंकड़ों और सूचनाओं पर आधारित होते हैं, जो इसे एक गतिशील और प्रभावी संधि बनाते हैं।
- किगाली संशोधन (2016): CFCs के विकल्प के रूप में उपयोग किए जाने वाले हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFCs), ओजोन परत के लिए तो सुरक्षित थे, लेकिन शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसें थीं। किगाली संशोधन ने HFCs को भी मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के दायरे में लाकर इनके उत्पादन और खपत को चरणबद्ध तरीके से कम करने का लक्ष्य रखा, जिससे जलवायु परिवर्तन से निपटने में भी महत्वपूर्ण योगदान मिला।
विश्लेषण: सफलता और चुनौतियां
सकारात्मक प्रभाव (सफलता):
- ओजोन परत की पुनर्प्राप्ति: प्रोटोकॉल के कारण 99% से अधिक ODS को चरणबद्ध तरीके से समाप्त कर दिया गया है, जिससे ओजोन परत ठीक होने की राह पर है।
- स्वास्थ्य लाभ: अनुमान है कि इस प्रोटोकॉल से 2030 तक सालाना त्वचा कैंसर के 2 मिलियन मामलों को रोका जा सकेगा।
- जलवायु सह-लाभ: चूँकि कई ODS शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसें भी हैं, उनके उन्मूलन ने जलवायु परिवर्तन को कम करने में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। किगाली संशोधन से इस सदी के अंत तक वैश्विक तापमान में 0.5∘C तक की वृद्धि को रोकने की उम्मीद है।
- प्रौद्योगिकी नवाचार: प्रोटोकॉल ने उद्योगों को ओजोन-अनुकूल और अधिक ऊर्जा-कुशल प्रौद्योगिकियों में निवेश और नवाचार के लिए प्रेरित किया।
चुनौतियां:
- अवैध व्यापार: प्रतिबंधित ODS का अवैध व्यापार अभी भी एक चुनौती बना हुआ है।
- पुराने उपकरणों का प्रबंधन: पुराने रेफ्रिजरेटर और एयर कंडीशनर में अभी भी ODS मौजूद हैं, जिनके सुरक्षित निपटान की आवश्यकता है।
- HFCs का चरणबद्ध उन्मूलन: किगाली संशोधन को पूरी तरह से लागू करना, विशेष रूप से विकासशील देशों के लिए, एक बड़ी चुनौती है, जिसके लिए निरंतर वित्तीय और तकनीकी सहायता की आवश्यकता होगी।
विश्व ओजोन दिवस केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि एक अनुस्मारक है कि जब विज्ञान, नीति और वैश्विक एकजुटता एक साथ काम करते हैं तो क्या हासिल किया जा सकता है। मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल की सफलता ने न केवल ओजोन परत को विनाश से बचाया है, बल्कि यह जलवायु परिवर्तन जैसी अधिक जटिल और व्यापक पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के लिए एक आशा की किरण और एक व्यावहारिक मॉडल भी प्रदान करता है। यह साबित करता है कि ठोस, महत्वाकांक्षी और सहयोगात्मक वैश्विक कार्रवाई के माध्यम से मानवता अपने सबसे गंभीर संकटों को दूर कर सकती है।




