
संसदीय विशेषाधिकार की अवधारणा क्या है?
परिचय
संसदीय विशेषाधिकार वे विशिष्ट अधिकार, प्रतिरक्षाएँ और छूट हैं, जो संसद के दोनों सदनों, उनकी समितियों और सदस्यों को उनके कार्यों के निर्बाध एवं प्रभावी संचालन के लिये प्रदान किए जाते हैं। ये अधिकार केवल सांसदों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि भारत के महान्यायवादी तक विस्तारित होते हैं, हालांकि राष्ट्रपति इन विशेषाधिकारों के दायरे में नहीं आते।
उद्देश्य
इन विशेषाधिकारों का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि संसद अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन बिना किसी बाहरी दबाव, भय या हस्तक्षेप के कर सके। यही कारण है कि ये अधिकार सामान्य नागरिकों या अन्य संस्थाओं को प्राप्त अधिकारों से कहीं अधिक व्यापक होते हैं।
संसदीय विशेषाधिकारों के प्रकार
- सामूहिक विशेषाधिकार
ये अधिकार पूरे सदन को एक इकाई के रूप में प्राप्त होते हैं। इनमें शामिल हैं—
- सदन की कार्यवाही को नियंत्रित करने का अधिकार
- अवमानना के मामलों में दंड देने की शक्ति
- अजनबियों को सदन से बाहर रखने का अधिकार
- अपनी गरिमा और प्राधिकार की रक्षा करने की शक्ति
- व्यक्तिगत विशेषाधिकार
ये अधिकार व्यक्तिगत सांसदों को प्रदान किए जाते हैं, ताकि वे स्वतंत्र रूप से अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर सकें, जैसे—
- संसद में वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
- सिविल मामलों में गिरफ्तारी से छूट
- संसदीय कार्यों के लिये कानूनी कार्रवाई से संरक्षण
संसदीय विशेषाधिकारों के स्रोत
संवैधानिक आधार
- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 105 और 122 संसद के सदस्यों से संबंधित विशेषाधिकारों को परिभाषित करते हैं, जबकि अनुच्छेद 194 और 212 राज्य विधानसभाओं के सदस्यों के लिये समान प्रावधान करते हैं।
वैधानिक आधार
- अनुच्छेद 105(3) के अनुसार, जब तक संसद किसी कानून द्वारा विशेषाधिकारों को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं करती, तब तक वे वही होंगे जो वर्ष 1950 में ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स को प्राप्त थे। अब तक इस विषय पर कोई समग्र कानून नहीं बनाया गया है, जिससे ब्रिटिश संसदीय परंपराओं की भूमिका आज भी महत्त्वपूर्ण बनी हुई है।
- इसके अतिरिक्त, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 संसदीय सत्रों के दौरान और उसके आसपास सिविल मामलों में गिरफ्तारी से छूट प्रदान करती है।
अन्य स्रोत
- संसदीय परंपराएँ और ब्रिटिश प्रथाएँ
- लोकसभा एवं राज्यसभा के कार्य संचालन नियम
- न्यायालयों द्वारा समय-समय पर दी गई व्याख्याएँ
विशेषाधिकार का उल्लंघन और विशेषाधिकार प्रस्ताव
- जब किसी सांसद या सदन के सामूहिक अधिकारों की अवहेलना की जाती है, तो उसे विशेषाधिकार का उल्लंघन माना जाता है।
- विशेषाधिकार प्रस्ताव सामान्यतः तब लाया जाता है, जब किसी मंत्री द्वारा तथ्यों को छिपाने, गलत या विकृत जानकारी देने के कारण सदन या उसके सदस्यों के अधिकार प्रभावित होते हैं। इसका उद्देश्य संबंधित मंत्री की निंदा करना होता है।
- वहीं, विशेषाधिकार नोटिस एक औपचारिक शिकायत होती है, जो किसी सांसद द्वारा किसी अन्य सदस्य या बाहरी व्यक्ति/संस्था के विरुद्ध दायर की जाती है, जैसे— सांसदों पर अपमानजनक टिप्पणियाँ।
विशेषाधिकार समिति की भूमिका
विशेषाधिकार समिति अर्द्ध-न्यायिक प्रकृति की होती है। इसका कार्य सदन या उसके सदस्यों के विशेषाधिकारों के उल्लंघन से जुड़े मामलों की जाँच करना और उचित कार्रवाई की सिफारिश करना होता है।
- लोकसभा की समिति में 15 सदस्य होते हैं
- राज्यसभा की समिति में 10 सदस्य होते हैं
सांसदों को प्राप्त प्रमुख व्यक्तिगत विशेषाधिकार
- वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 105(1))
- कानूनी कार्यवाही से सुरक्षा – संसद या उसकी समितियों में दिए गए भाषण या मत के लिये कोई मुकदमा नहीं
- अनुमोदित प्रकाशनों की सुरक्षा – संसद द्वारा अधिकृत रिपोर्टों के प्रकाशन पर कानूनी कार्रवाई नहीं
- न्यायिक हस्तक्षेप से संरक्षण – प्रक्रिया संबंधी अनियमितताओं के आधार पर न्यायालय कार्यवाही की वैधता की जाँच नहीं कर सकते
- गिरफ्तारी से छूट – सिविल मामलों में सत्र से 40 दिन पहले और 40 दिन बाद तक
- जूरी सेवा और अनिवार्य गवाही से छूट
संसद के सामूहिक विशेषाधिकार
- कार्यवाही और बहस के प्रकाशन का विशेष अधिकार
- गोपनीय बैठकों का आयोजन
- अपने नियम बनाने और अनुशासन लागू करने की शक्ति
- सदस्यों या बाहरी व्यक्तियों को फटकार, निलंबन, निष्कासन या कारावास तक दंडित करने का अधिकार
- गिरफ्तारी या हिरासत की सूचना सदन को देने की अनिवार्यता
- जाँच, समन और दस्तावेज़ मांगने की शक्ति
सदन की अवमानना (Contempt of House)
- सदन की अवमानना, विशेषाधिकार उल्लंघन की तुलना में एक व्यापक अवधारणा है। इसमें ऐसे सभी कार्य या चूक शामिल हैं, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सदन, उसके सदस्यों या अधिकारियों के कार्यों में बाधा डालते हैं या उसके प्राधिकार को कमजोर करते हैं।
- जहाँ सभी विशेषाधिकार उल्लंघन सदन की अवमानना माने जाते हैं, वहीं अवमानना किसी विशिष्ट विशेषाधिकार के उल्लंघन के बिना भी हो सकती है—जैसे समिति के समक्ष उपस्थित न होना या सांसदों के खिलाफ अपमानजनक प्रकाशन।
संसदीय विशेषाधिकारों पर प्रमुख न्यायिक निर्णय
- सर्चलाइट केस, 1958: विधायी विशेषाधिकार प्रेस की स्वतंत्रता पर प्राथमिकता रखते हैं
- पी.वी. नरसिम्हा राव मामला, 1998: सदन में दिए गए मत/भाषण के लिये भ्रष्टाचार का अभियोजन नहीं
- के. अजित मामला, 2021: विशेषाधिकार सामान्य आपराधिक कानूनों से पूर्ण छूट नहीं देते
- सीता सोरेन मामला, 2024: रिश्वतखोरी संवैधानिक संरक्षण के दायरे में नहीं आती
प्रमुख विवाद और बहस
- विशेषाधिकारों के संहिताकरण की आवश्यकता या अनावश्यकता
- प्रेस की स्वतंत्रता और विधायी दंड शक्ति के बीच तनाव
- विधि के समक्ष समानता बनाम गिरफ्तारी से छूट
- राजनीतिक प्रतिशोध के लिये विशेषाधिकारों का दुरुपयोग
- अपारदर्शी प्रक्रियाओं से जनता के विश्वास में गिरावट
विशेषाधिकार उल्लंघन की प्रक्रिया
- सदस्य द्वारा अध्यक्ष को लिखित सूचना
- अध्यक्ष द्वारा प्रारंभिक जाँच और अनुमति
- सदन की अनुमति (25 सदस्यों का समर्थन आवश्यक)
- सदन द्वारा निपटारा या समिति को संदर्भ
- दंड—फटकार, निलंबन, निष्कासन या कारावास
सुधार की दिशा में आवश्यक कदम
- लचीला लेकिन स्पष्ट वैधानिक ढाँचा
- पारदर्शी और मानकीकृत प्रक्रियाएँ
- आचार संहिता और नैतिकता समितियों को सशक्त बनाना
- विशेषाधिकारों और मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन
- न्यायालयों की सामंजस्यपूर्ण व्याख्या को संस्थागत रूप देना
अंतर्राष्ट्रीय अनुभव
- यूके: कानून, परंपरा और मिसालों पर आधारित विशेषाधिकार
- कनाडा: संविधान अधिनियम और संसद अधिनियम द्वारा परिभाषित
- ऑस्ट्रेलिया: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और स्वनियमन पर बल
निष्कर्ष
संसदीय विशेषाधिकार विधायिका की स्वतंत्रता और गरिमा के लिये अनिवार्य हैं, किंतु उनका विवेकपूर्ण, पारदर्शी और उत्तरदायी उपयोग ही लोकतंत्र को मज़बूत करता है। हालिया घटनाएँ यह स्पष्ट करती हैं कि अधिकारों के साथ-साथ आत्म-संयम और नैतिक उत्तरदायित्व भी उतने ही आवश्यक हैं, ताकि संसद में जनता का विश्वास बना रहे




