
दीपावली, जिसे प्रकाश का त्योहार भी कहा जाता है, को यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया गया है। यह ऐतिहासिक घोषणा यूनेस्को की अंतर-सरकारी समिति के 20वें सत्र के दौरान की गई।
विरासत सूची में शामिल होने का महत्व
दीपावली को इस सूची में शामिल करना केवल सम्मान का विषय नहीं है, बल्कि इसे एक जीवंत सांस्कृतिक विरासत के रूप में वैश्विक मान्यता दिलाता है।
- सामाजिक बंधनों को मजबूत करना: यह त्योहार परिवार और समुदाय को एकजुट करता है।
- परंपरागत शिल्प कौशल का संवर्धन: मिट्टी के दीयों, रंगोली और सजावट के माध्यम से स्थानीय शिल्प कौशल को बढ़ावा मिलता है।
- उदारता और खुशहाली का संदेश: दीपावली आत्मीयता, सहयोग और सामाजिक भाईचारे के मूल्यों को प्रोत्साहित करता है।
- सतत विकास लक्ष्यों में योगदान:
- आजीविका संवर्धन
- लैंगिक समानता
- सांस्कृतिक शिक्षा
- सामुदायिक कल्याण
प्रधानमंत्री का बयान:
- इस सम्मान से भारत और दुनिया भर के लोगों के लिए उत्साह बढ़ा है।
- दीपावली भारतीय संस्कृति और लोकाचार का प्रतीक है, जो ज्ञान और धार्मिकता से जुड़ा है।
- यूनेस्को की सूची में शामिल होने से महोत्सव की वैश्विक लोकप्रियता बढ़ने की उम्मीद है।
केंद्रीय संस्कृति मंत्री का बयान:
- यह मान्यता उन समुदायों के लिए गर्व का विषय है जो दीपावली की भावना को संजोते हैं।
- उत्सव जन-केंद्रित है, जिसमें समुदाय के विभिन्न सदस्य योगदान देते हैं:
- मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कुम्हार परंपरागत दीये बनाते हैं।
- कारीगर उत्सव की सजावट तैयार करते हैं।
- किसान, मिठाई बनाने वाले, पुजारी और परिवार परंपराओं को कायम रखते हैं।
भारतीय प्रवासी समुदाय की भूमिका
- दीपावली का उत्सव विभिन्न महाद्वीपों में भारतीय प्रवासियों के माध्यम से फैलता है।
- विदेशों में दीपावली के आयोजन से भारतीय संस्कृति की वैश्विक पहुँच और पहचान मजबूत होती है।
अतिरिक्त बिंदु (Points to Highlight)
- दीपावली में दीप जलाने और रंगोली बनाने की परंपरा लोगों को सृजनात्मक गतिविधियों में शामिल करती है।
- सामुदायिक आयोजन और मेलों के माध्यम से सामाजिक सहयोग और स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन मिलता है।
- पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए अब सस्टेनेबल और इको-फ्रेंडली दीपावली की पहल बढ़ रही है।




