
पेरिस समझौते के 10 वर्ष: उपलब्धियाँ, चुनौतियाँ और आगे की राह
चर्चा में क्यों है पेरिस समझौता?
पेरिस समझौता, जिसे वर्ष 2015 में जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) के तहत अंगीकार किया गया था, नवंबर 2025 में अपने दस वर्ष पूर्ण कर चुका है। इस अवसर पर वैश्विक स्तर पर इसकी प्रभावशीलता, प्रासंगिकता और वास्तविक परिणामों का पुनर्मूल्यांकन किया जा रहा है। बदलते जलवायु परिदृश्य, बढ़ते चरम मौसमीय घटनाएँ और विकासशील देशों की बढ़ती आवश्यकताओं के बीच यह मूल्यांकन और अधिक महत्त्वपूर्ण हो गया है।
पेरिस समझौते का समग्र सार
पेरिस समझौते ने जलवायु कार्रवाई को पहली बार सार्वभौमिक स्वरूप प्रदान किया, जिसमें विकसित और विकासशील—दोनों प्रकार के देशों को एक ही ढाँचे में शामिल किया गया। इसने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC), पारदर्शिता व्यवस्था, और वैश्विक स्टॉकटेक (Global Stocktake) जैसे तंत्रों के माध्यम से शमन, अनुकूलन और जलवायु वित्त को वैश्विक नीति-निर्माण की मुख्यधारा में स्थापित किया।
हालाँकि, एक दशक के अनुभव से यह भी स्पष्ट हुआ है कि समझौता कमज़ोर जवाबदेही, अपर्याप्त वित्तीय प्रवाह, समानता से जुड़ी चिंताओं, और महत्त्वाकांक्षा के अंतराल जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है। इन कमियों ने यह संकेत दिया है कि अब केवल राजनीतिक घोषणाओं से आगे बढ़कर मज़बूत, लागू करने योग्य और न्यायसंगत जलवायु कार्रवाई की आवश्यकता है।
पेरिस समझौता क्या है?
पेरिस समझौता जलवायु परिवर्तन से निपटने हेतु UNFCCC के अंतर्गत एक विधिक रूप से बाध्यकारी वैश्विक समझौता है, जिसे वर्ष 2015 में COP-21 (पेरिस, फ्रांस) में अपनाया गया। इसने क्योटो प्रोटोकॉल का स्थान लिया, जो केवल विकसित देशों पर बाध्यकारी उत्सर्जन कटौती लागू करता था।
उद्देश्य
इस समझौते का प्रमुख उद्देश्य वैश्विक औसत तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तरों की तुलना में 2°C से काफी नीचे रखना और इसे 1.5°C तक सीमित रखने के प्रयास करना है, ताकि जलवायु परिवर्तन के विनाशकारी प्रभावों को रोका जा सके।
कार्यप्रणाली
पेरिस समझौता पाँच-वर्षीय चक्र पर आधारित है, जिसके अंतर्गत प्रत्येक देश को:
- अपने NDC प्रस्तुत और अद्यतन करने होते हैं
- ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती
- अनुकूलन रणनीतियाँ
- जलवायु वित्त, प्रौद्योगिकी और क्षमता निर्माण से संबंधित योजनाएँ बतानी होती हैं
वर्ष 2023 में पहला वैश्विक स्टॉकटेक COP-28 में संपन्न हुआ, जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि वर्ष 2030 तक शमन, अनुकूलन और वित्त—तीनों क्षेत्रों में तीव्र कार्रवाई आवश्यक है, साथ ही जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता को क्रमशः समाप्त करने पर बल दिया गया।
पेरिस समझौते की प्रमुख उपलब्धियाँ
- सार्वभौमिक भागीदारी: लगभग 194 देश और यूरोपीय संघ एक साझा जलवायु ढाँचे में सम्मिलित हुए, जो पेरिस समझौते की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
- जलवायु वित्त प्रतिबद्धता: विकसित देशों ने वर्ष 2025 तक विकासशील देशों के लिये प्रति वर्ष 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर जुटाने की प्रतिबद्धता की।
इसके अतिरिक्त, COP-29 (बाकू, अज़रबैजान, 2024) में एक नया सामूहिक परिमाणित लक्ष्य (NCQG) तय किया गया, जिसके अंतर्गत वर्ष 2035 तक कम-से-कम 300 बिलियन अमेरिकी डॉलर प्रतिवर्ष का लक्ष्य रखा गया। - समानता का सिद्धांत: पेरिस समझौते में सामान्य लेकिन विभेदित ज़िम्मेदारियाँ (CBDR) के सिद्धांत को स्वीकार किया गया, जिससे देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारियों और क्षमताओं को मान्यता मिली।
- जलवायु नीति का मुख्यधारा में समावेशन: जलवायु कार्रवाई को राष्ट्रीय कानूनों, बजटों और विकास योजनाओं में शामिल किया गया—जैसे:
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- यूरोपीय संघ का ग्रीन डील
- भारत का मिशन LiFE
5. जलवायु बाज़ारों और निवेश को बढ़ावा: ग्रीन बॉन्ड, कार्बन बाज़ार और जलवायु निवेशों का विस्तार हुआ, हालाँकि इनकी मात्रा अभी भी अपर्याप्त मानी जाती है।
भारत और पेरिस समझौता
भारत ने वर्ष 2015 में UNFCCC के समक्ष अपना INDC प्रस्तुत किया, जिसे बाद में वर्ष 2030 तक के लिये उसका पहला NDC माना गया।
अद्यतन NDC के अंतर्गत भारत ने:
- GDP की उत्सर्जन तीव्रता में 2005 के स्तर से 45% की कमी
- स्थापित विद्युत क्षमता का लगभग 50% गैर-जीवाश्म स्रोतों से
- 2.5–3 बिलियन टन CO₂ समतुल्य कार्बन सिंक का सृजन
- LiFE आंदोलन के माध्यम से सतत जीवनशैली को बढ़ावा
भारत ने COP-26 में वर्ष 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन का लक्ष्य घोषित किया और ISA, CDRI तथा LiFE जैसी पहलों के माध्यम से वैश्विक नेतृत्व प्रदर्शित किया।
पेरिस समझौते से जुड़ी प्रमुख चिंताएँ
- स्वैच्छिक प्रतिबद्धताओं के कारण जवाबदेही कमज़ोर
- CBDR सिद्धांत का क्षरण और ऐतिहासिक उत्सर्जन की अनदेखी
- जलवायु वित्त की गंभीर कमी, NCQG को भारत द्वारा अपर्याप्त माना गया
- शमन पर अत्यधिक ज़ोर, अनुकूलन की उपेक्षा
- विकासशील देशों पर व्यापारिक प्रतिबंधों का दबाव (जैसे CBAM)
- वर्तमान NDCs विश्व को 2.5°C–2.9°C तापवृद्धि की ओर ले जा रहे हैं
जलवायु कार्रवाई को मज़बूत करने के लिये आवश्यक उपाय
- स्वैच्छिक से कानूनी रूप से बाध्यकारी नीतियों की ओर संक्रमण
- शमन और अनुकूलन के बीच संतुलित दृष्टिकोण
- जलवायु वित्त अंतर को पाटने हेतु बहुपक्षीय सुधार
- CBDR-RC आधारित जलवायु न्याय को सुदृढ़ बनाना
- प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और दक्षिण-दक्षिण सहयोग
- वैज्ञानिक डेटा और पारदर्शी शासन तंत्र को मज़बूती
जलवायु कार्रवाई में चीन मॉडल
चीन का मॉडल विकास-प्रथम दृष्टिकोण पर आधारित है, जिसमें औद्योगिकीकरण के साथ-साथ नवीकरणीय ऊर्जा और स्वच्छ प्रौद्योगिकियों में बड़े पैमाने पर निवेश किया गया।
इस मॉडल के अंतर्गत चीन ने:
- 2030 से पहले उत्सर्जन चरम पर पहुँचाने
- 2060 तक नेट-ज़ीरो लक्ष्य
की प्रतिबद्धता जताई है, जो यह दर्शाता है कि प्रारंभिक स्वच्छ ऊर्जा निवेश दीर्घकाल में उत्सर्जन कटौती को संभव बनाता है।
UNFCCC और COP का परिचय
- UNFCCC जलवायु परिवर्तन पर वैश्विक निर्णय लेने वाला मंच है
- COP इसकी सर्वोच्च निर्णयकारी संस्था है
- COP की बैठकें प्रतिवर्ष आयोजित की जाती हैं
- प्रथम COP वर्ष 1995 में बर्लिन, जर्मनी में आयोजित हुआ
प्रमुख COP और उनके परिणाम
- COP-3 (1997, क्योटो): क्योटो प्रोटोकॉल
- COP-7 (2001, माराकेच): कार्यान्वयन नियम
- COP-13 (2007, बाली): बाली रोडमैप
- COP-21 (2015, पेरिस): पेरिस समझौता
- COP-26 (2021, ग्लासगो): 1.5°C लक्ष्य पर ज़ोर
COP-29 (2024, बाकू, अज़रबैजान)
- नया NCQG लक्ष्य – 2035 तक 300 बिलियन डॉलर प्रतिवर्ष
- जलवायु वित्त, अनुकूलन और क्षमता निर्माण पर फोकस
- भारत ने अपर्याप्त वित्त पर असहमति जताई
निष्कर्ष
पेरिस समझौते ने जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध वैश्विक सहयोग की एक मज़बूत नींव रखी है, किंतु कम जवाबदेही, वित्तीय अंतर और समानता संबंधी मुद्दे अब भी इसकी प्रभावशीलता को सीमित करते हैं। भविष्य की जलवायु रणनीति के लिये आवश्यक है कि प्रतिबद्धताएँ लागू करने योग्य, वित्त पूर्वानुमेय और पर्याप्त, तथा शमन और अनुकूलन—दोनों को समान प्राथमिकता दी जाएँ। भारत के लिये विकास और जलवायु लक्ष्यों का समन्वय ही एक संतुलित और व्यवहारिक मार्ग प्रस्तुत करता है।




