
बिहार में बाढ़ : कारण, प्रभाव, सरकारी उपाय और निवारण रणनीतियाँ
भूमिका
बिहार भारत के सबसे अधिक बाढ़-प्रभावित राज्यों में से एक है। राज्य का भौगोलिक स्वरूप, हिमालयी जलग्रहण क्षेत्रों पर निर्भरता और मैदानी ढाल की कमी बाढ़ को यहाँ एक लगातार दोहराने वाली आपदा बनाती है।
विशेषकर उत्तर बिहार, जहाँ राज्य की लगभग 76% जनसंख्या निवास करती है, हर वर्ष मानसून के दौरान गंभीर बाढ़ संकट का सामना करता है। आँकड़ों के अनुसार, भारत के कुल बाढ़-प्रभावित क्षेत्र और जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा बिहार में केंद्रित है।
बिहार में बाढ़ की भौगोलिक पृष्ठभूमि
बिहार गंगा के मैदान में स्थित है और यहाँ प्रवाहित अधिकांश नदियाँ हिमालयी एवं सीमापार क्षेत्रों से आती हैं। ये नदियाँ अपने साथ अत्यधिक जल और गाद लेकर आती हैं, जिससे नदी तल ऊँचा होता जाता है और जल निकासी की क्षमता कम हो जाती है।
कम ढाल वाला भूभाग, चौड़े बाढ़ मैदान और मानसून पर अत्यधिक निर्भरता बाढ़ की गंभीरता को और बढ़ा देती है।
बिहार में बाढ़ के प्रमुख कारण
1. ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में भारी वर्षा
- नेपाल के पर्वतीय क्षेत्रों में होने वाली तीव्र मानसूनी वर्षा का सीधा प्रभाव बिहार के मैदानी भागों पर पड़ता है। कम समय में अधिक जल आने से नदियाँ उफान पर आ जाती हैं और बाढ़ की स्थिति बनती है।
2. अत्यधिक गाद संचयन
- हिमालयी क्षेत्रों से आने वाली नदियाँ भारी मात्रा में गाद लाती हैं। इससे नदी की गहराई कम होती जाती है और जल फैलकर आसपास के क्षेत्रों में प्रवेश कर जाता है।
3. वनों की कटाई और भूमि उपयोग परिवर्तन
- ऊपरी क्षेत्रों में वनों की कटाई से जल का प्राकृतिक अवशोषण घट गया है। परिणामस्वरूप सतही अपवाह बढ़ता है, जिससे बाढ़ अधिक तीव्र हो जाती है।
4. तटबंध-आधारित नियंत्रण की सीमाएँ
- लंबे समय तक तटबंधों पर निर्भर रहने से नदियों का प्राकृतिक फैलाव बाधित हुआ है। तटबंध टूटने की स्थिति में क्षति और अधिक विनाशकारी हो जाती है।
5. बाढ़ मैदानों में मानव बसावट
- प्राकृतिक बाढ़ मैदानों में बढ़ती आबादी और कृषि गतिविधियों के कारण बाढ़ अब अधिक जान-माल की हानि पहुँचाने लगी है।
6. जलवायु परिवर्तन का प्रभाव
- अनियमित मानसून, अत्यधिक वर्षा की घटनाएँ और मौसम की अनिश्चितता बाढ़ जोखिम को और बढ़ा रही हैं।
बिहार में बाढ़ के प्रभाव
बाढ़ का प्रभाव केवल तात्कालिक नहीं बल्कि दीर्घकालिक होता है। इससे कृषि उत्पादन प्रभावित होता है, बुनियादी ढाँचा क्षतिग्रस्त होता है, स्वास्थ्य संकट उत्पन्न होता है और गरीबी व पलायन जैसी सामाजिक समस्याएँ बढ़ती हैं।
1. सामाजिक प्रभाव
- जन-धन की हानि: हर वर्ष बड़ी संख्या में लोगों की मृत्यु और पशुधन की क्षति।
- विस्थापन: लाखों लोग अस्थायी शिविरों में शरण लेने को मजबूर।
- स्वास्थ्य समस्याएँ: जलजनित रोग—हैजा, डायरिया, मलेरिया, डेंगू का प्रकोप।
- शिक्षा बाधित: स्कूल भवन क्षतिग्रस्त, पढ़ाई में लंबा व्यवधान।
2. आर्थिक प्रभाव
- कृषि क्षति: धान, मक्का, दलहन व सब्ज़ियों की फसल नष्ट; किसानों की आय प्रभावित।
- अवसंरचना नुकसान: सड़क, पुल, तटबंध, बिजली व संचार व्यवस्था क्षतिग्रस्त।
- गरीबी व ऋण: आजीविका ठप होने से कर्ज़ और गरीबी में वृद्धि।
3. पर्यावरणीय प्रभाव
- मृदा अपरदन: उपजाऊ मिट्टी का कटाव।
- नदी मार्ग परिवर्तन: कोसी जैसी नदियों द्वारा धारा बदलना, नए कटाव क्षेत्र।
- जैव विविधता पर असर: आर्द्रभूमि व वन्यजीव आवास प्रभावित।
4. प्रशासनिक एवं विकासात्मक प्रभाव
- विकास योजनाओं में बाधा: संसाधन राहत-बचाव में लगने से दीर्घकालिक परियोजनाएँ प्रभावित।
- राजकोषीय दबाव: राहत, पुनर्वास व पुनर्निर्माण पर भारी व्यय।
बिहार में बाढ़ नियंत्रण हेतु सरकारी उपाय
1. संरचनात्मक उपाय
- राज्य में लगभग 3000 किलोमीटर तटबंधों का निर्माण किया गया है ताकि नदियों के बहाव को सीमित किया जा सके। इनका उद्देश्य बाढ़ के पानी को आबादी वाले क्षेत्रों में प्रवेश करने से रोकना है, हालाँकि रखरखाव एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
2. आपदा प्रबंधन तंत्र का सुदृढ़ीकरण
- राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (SDRF) का गठन किया गया है, जो बाढ़ के समय खोज, बचाव और राहत कार्यों को त्वरित रूप से संचालित करता है। बाढ़-प्रवण जिलों में नाव, लाइफ जैकेट और अन्य आवश्यक उपकरण उपलब्ध कराए गए हैं।
3. राहत एवं बचाव अवसंरचना का विकास
- राहत सामग्री के सुरक्षित भंडारण के लिए गोदाम बनाए गए हैं ताकि आपदा के समय त्वरित वितरण संभव हो सके। इसके साथ ही स्थानीय स्तर पर आपातकालीन संचालन केंद्र स्थापित किए गए हैं, जो राहत कार्यों का समन्वय करते हैं।
4. तकनीकी एवं संचार प्रणाली का विस्तार
- आपदा के दौरान संचार बाधित न हो, इसके लिए उपग्रह आधारित संचार उपकरणों का उपयोग किया जा रहा है। त्वरित सूचना प्रसारण व्यवस्था से प्रशासन और आम जनता को समय पर चेतावनी दी जाती है।
5. प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली का विकास
- बाढ़ जोखिम का पूर्व आकलन किया जाता है और मौसम व जलस्तर के आधार पर पूर्वानुमान जारी किए जाते हैं। समय पर सूचना और तैयारी से जन-धन की हानि को कम करने का प्रयास किया जाता है।
बिहार में बाढ़ से निवारण एवं दीर्घकालिक समाधान
- दीर्घकालिक समाधान के लिए केवल तटबंधों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। प्राकृतिक जल भंडारण क्षेत्रों का संरक्षण, वैज्ञानिक नदी प्रबंधन, भूमि उपयोग नियोजन और जन-जागरूकता अत्यंत आवश्यक है।
- साथ ही, सीमापार जल प्रबंधन सहयोग और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखना भी बाढ़ नियंत्रण की कुंजी है।
निष्कर्ष
बिहार में बाढ़ एक बहुआयामी समस्या है, जिसमें प्राकृतिक, भौगोलिक और मानवीय सभी कारक शामिल हैं। यदि बाढ़ को केवल आपदा के रूप में देखा जाएगा, तो समाधान सीमित रहेंगे। आवश्यक है कि बाढ़ प्रबंधन को आपदा प्रतिक्रिया से आगे बढ़ाकर आपदा जोखिम न्यूनीकरण और अनुकूलन रणनीति के रूप में अपनाया जाए। समन्वित नीति, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और स्थानीय सहभागिता के माध्यम से ही बिहार बाढ़ की चुनौती का स्थायी समाधान निकाल सकता है।




