भारत में अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली

भारत के लिये अपशिष्ट प्रबंधन अब अस्तित्व का प्रश्न क्यों है?


भूमिका:

COP30 में वैश्विक नेताओं, नीति निर्माताओं और पर्यावरण विशेषज्ञों ने यह स्पष्ट किया कि अपशिष्ट प्रबंधन अब केवल शहरी स्वच्छता या नगरपालिकाओं की प्रशासनिक जिम्मेदारी तक सीमित विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह जलवायु परिवर्तन, सार्वजनिक स्वास्थ्य, संसाधन सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता से सीधे जुड़ा हुआ एक केंद्रीय मुद्दा बन चुका है।

अनियंत्रित शहरी अपशिष्ट, विशेष रूप से जैविक अपशिष्ट, जब खुले डंपसाइटों और अवैज्ञानिक लैंडफिल में सड़ता है, तो उससे मीथेन गैस का उत्सर्जन होता है। मीथेन अल्पकाल में कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है, जिससे वैश्विक तापवृद्धि की गति तेज होती है।

भारत जैसे विकासशील देश में, जहाँ शहरीकरण की रफ्तार बहुत तेज है, यह समस्या और भी गंभीर हो जाती है। अनुमान है कि:

  • वर्ष 2030 तक भारतीय शहरों में 16.5 करोड़ टन अपशिष्ट प्रतिवर्ष उत्पन्न होगा
  • वर्ष 2050 तक यह मात्रा बढ़कर 43.5 करोड़ टन हो जाएगी
  • इसके परिणामस्वरूप 41 करोड़ टन से अधिक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन होगा

अपशिष्ट से ग्रस्त शहरों की यह वास्तविकता केवल पर्यावरण को ही नुकसान नहीं पहुँचाती, बल्कि यह वायु गुणवत्ता, जल सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, शहरी बुनियादी ढाँचे और आर्थिक उत्पादकता को भी गहराई से प्रभावित करती है।

स्वच्छ भारत मिशन, SBM-U 2.0 और मिशन LiFE जैसी सरकारी पहलें इस बात को रेखांकित करती हैं कि अब भारत को पारंपरिक ‘एकत्र करो–फेंक दो (Collect–Dump)’ मॉडल से आगे बढ़कर एक चक्रीय अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली अपनानी होगी, जहाँ अपशिष्ट को समस्या नहीं बल्कि संसाधन के रूप में देखा जाए।

भारत में अपशिष्ट उत्पादन की वर्तमान स्थिति

1. कुल अपशिष्ट उत्पादन की प्रवृत्ति

भारत में अपशिष्ट उत्पादन में निरंतर वृद्धि हो रही है, जिसका प्रमुख कारण जनसंख्या वृद्धि, तीव्र शहरीकरण, उपभोग आधारित जीवनशैली और पैकेजिंग पर बढ़ती निर्भरता है। हालिया अनुमानों के अनुसार:

  • भारत प्रतिदिन लगभग 1,70,000 टन नगरपालिका ठोस अपशिष्ट उत्पन्न करता है
  • यह वार्षिक रूप से लगभग 6.2 करोड़ टन के बराबर है

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के अनुसार, विकासशील देशों में अपशिष्ट उत्पादन की वृद्धि दर विकसित देशों की तुलना में कहीं अधिक है। इस कारण अपशिष्ट प्रबंधन अब केवल स्वच्छता से जुड़ा विषय न रहकर पर्यावरणीय शासन और शहरी प्रबंधन की एक गंभीर चुनौती बन गया है।

2. शहरी और ग्रामीण अपशिष्ट उत्पादन में अंतर

भारत में शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच अपशिष्ट उत्पादन और प्रबंधन के स्वरूप में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है।

पहलू शहरी क्षेत्र ग्रामीण क्षेत्र
प्रति व्यक्ति अपशिष्ट अधिक अपेक्षाकृत कम
अपशिष्ट की प्रकृति मिश्रित, प्लास्टिक प्रधान मुख्यतः जैव-अपघटनीय
संग्रहण व्यवस्था अपेक्षाकृत संगठित अक्सर असंगठित
प्रमुख समस्या अत्यधिक मात्रा वैज्ञानिक प्रबंधन का अभाव

शहरी क्षेत्रों में 2030 तक 16.5 करोड़ टन वार्षिक अपशिष्ट उत्पन्न होने का अनुमान है, जिससे नगरपालिका प्रणालियों पर भारी दबाव पड़ेगा। वहीं ग्रामीण भारत में, हालाँकि अपशिष्ट की मात्रा कम है, लेकिन संगठित संग्रहण, प्रसंस्करण और निपटान की कमी के कारण खुले में फेंकना और दहन जैसी समस्याएँ व्यापक हैं।

भारत में अपशिष्ट के प्रकार और उनकी संरचना

1. जैविक (गीला) अपशिष्ट: सबसे बड़ी चुनौती

जैविक अपशिष्ट में भोजन के अवशेष, सब्ज़ियों और फलों के छिलके, बाज़ारों का कचरा, बगीचों का अपशिष्ट आदि शामिल हैं। भारत के अधिकांश शहरों में:

  • नगरपालिका ठोस अपशिष्ट का 50% से अधिक हिस्सा जैविक होता है
  • लैंडफिल में जाने पर यह अपशिष्ट अवायवीय अपघटन से मीथेन गैस उत्पन्न करता है

जैविक अपशिष्ट → अवैज्ञानिक लैंडफिल → मीथेन उत्सर्जन → जलवायु परिवर्तन + दुर्गंध + रोग

यदि इसी अपशिष्ट को स्रोत पर अलग कर खाद या बायो-मीथेन में बदला जाए, तो यह समस्या के बजाय समाधान बन सकता है।

2. शुष्क अपशिष्ट: छुपा हुआ संसाधन

शुष्क अपशिष्ट में काग़ज़, गत्ता, काँच, धातु, कपड़ा और रबर जैसी वस्तुएँ शामिल हैं। सरकारी अध्ययनों के अनुसार:

  • भारत में नगरपालिका ठोस अपशिष्ट का लगभग 35% हिस्सा शुष्क अपशिष्ट है
  • उचित पृथक्करण होने पर इसका बड़ा भाग पुनर्चक्रण योग्य है

हालाँकि, गीले अपशिष्ट के साथ मिल जाने के कारण यह दूषित हो जाता है और इसका पुनर्चक्रण कठिन व महँगा हो जाता है।

3. प्लास्टिक अपशिष्ट

भारत में प्रतिवर्ष लगभग 56 लाख टन प्लास्टिक अपशिष्ट उत्पन्न होता है। इसमें:

  • एकल-उपयोग प्लास्टिक
  • मल्टी-लेयर्ड पैकेजिंग
  • PET बोतलें और प्लास्टिक फिल्म

प्राकृतिक रूप से नष्ट न होने के कारण प्लास्टिक दशकों तक पर्यावरण में बना रहता है और खाद्य शृंखला में प्रवेश कर जाता है।

4. इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट (ई-अपशिष्ट)

डिजिटलीकरण और गैजेट्स के तीव्र प्रतिस्थापन के कारण भारत ई-अपशिष्ट के सबसे तेजी से बढ़ते उत्पादकों में शामिल है:

  • पिछले 5 वर्षों में 73% की वृद्धि
  • वर्ष 2023–24 में 1.751 मिलियन मीट्रिक टन ई-अपशिष्ट
  • 2030 तक 340 किलोटन सौर अपशिष्ट का अनुमान

ई-अपशिष्ट में भारी धातुएँ और विषैले तत्व होते हैं, जिनका अनुचित निपटान गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा करता है।

5. जैव-चिकित्सा अपशिष्ट

अस्पतालों, क्लीनिकों और प्रयोगशालाओं से उत्पन्न जैव-चिकित्सा अपशिष्ट अत्यधिक संक्रामक होता है।

  • दिल्ली जैसे शहरों में प्रतिदिन लगभग 40 टन जैव-चिकित्सा अपशिष्ट उत्पन्न होता है
  • इसका अनुचित प्रबंधन संक्रमण और महामारी के जोखिम को बढ़ाता है

6. खतरनाक औद्योगिक अपशिष्ट

CPCB के अनुसार, भारत में प्रतिवर्ष लगभग 7.9 मिलियन टन खतरनाक औद्योगिक अपशिष्ट उत्पन्न होता है।

इसमें विषैले, ज्वलनशील और संक्षारक पदार्थ शामिल होते हैं, जिनका सुरक्षित भंडारण और निपटान अभी भी एक बड़ी चुनौती है।

7. निर्माण एवं विध्वंस (C&D) अपशिष्ट

तेज़ शहरीकरण और अधोसंरचना विस्तार के कारण:

  • भारत में प्रतिवर्ष 10–12 मिलियन टन C&D अपशिष्ट उत्पन्न होता है
  • इसका बड़ा हिस्सा अवैध रूप से सड़कों, खुले भूखंडों और जल निकायों में फेंका जाता है

इससे शहरी बाढ़, धूल प्रदूषण और भूमि क्षरण जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।

भारत में अपशिष्ट प्रबंधन को नियंत्रित करने वाला नियामक एवं संस्थागत ढाँचा

भारत में अपशिष्ट प्रबंधन के लिये कोई एकल समेकित अधिनियम नहीं है। इसके बजाय, विभिन्न प्रकार के अपशिष्टों के लिये अलग-अलग नियम बनाए गए हैं, जिन्हें समय-समय पर संशोधित किया गया है ताकि बदलती शहरी वास्तविकताओं, जलवायु लक्ष्यों और विस्तारित निर्माता उत्तरदायित्व (EPR) जैसे नए तंत्रों को शामिल किया जा सके।

प्रमुख वैधानिक नियम

अपशिष्ट धारा लागू नियम मुख्य प्रावधान
नगरपालिका ठोस अपशिष्ट ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 स्रोत पर पृथक्करण, थोक अपशिष्ट उत्पादकों की जिम्मेदारी
प्लास्टिक अपशिष्ट प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 एकल-उपयोग प्लास्टिक पर प्रतिबंध, EPR
ई-अपशिष्ट ई-अपशिष्ट (प्रबंधन) नियम, 2022 अनिवार्य EPR लक्ष्य, डिजिटल ट्रैकिंग
C&D अपशिष्ट C&D अपशिष्ट नियम, 2016 / 2025 रीसाइक्लिंग और पुन: उपयोग अनिवार्य
जैव-चिकित्सा अपशिष्ट BMW नियम, 2016 रंग-आधारित पृथक्करण, वैज्ञानिक उपचार
खतरनाक अपशिष्ट HOWM नियम, 2016 सुरक्षित भंडारण और निपटान

संस्थागत संरचना

  • MoEFCC: राष्ट्रीय नीति निर्माण और नियम अधिसूचना
  • CPCB: तकनीकी मानक, EPR पोर्टल और निगरानी
  • SPCB/PCC: राज्य स्तर पर प्रवर्तन
  • ULBs: संग्रहण, परिवहन और प्रसंस्करण की जमीनी जिम्मेदारी

भारत की अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली में प्रमुख कमियाँ

1. स्रोत पर पृथक्करण की लगातार विफलता

कानूनी अनिवार्यता के बावजूद, दिल्ली और मुंबई जैसे महानगर भी कुल अपशिष्ट का 50% से कम ही पृथक कर पा रहे हैं। मिश्रित अपशिष्ट के कारण:

  • पुनर्चक्रण योग्य सामग्री दूषित हो जाती है
  • जैविक अपशिष्ट का कम्पोस्ट या बायो-मीथेन में रूपांतरण संभव नहीं हो पाता
  • उपचार लागत कई गुना बढ़ जाती है

2. लैंडफिल पर अत्यधिक निर्भरता

भारत में नगरपालिका अपशिष्ट का 50% से अधिक हिस्सा अभी भी डंपसाइटों में जाता है। गाजीपुर (दिल्ली) और देवनार (मुंबई) जैसे स्थल:

  • निरंतर मीथेन उत्सर्जन करते हैं
  • भूजल को विषैले लीचेट से प्रदूषित करते हैं
  • बार-बार आग लगने से वायु प्रदूषण बढ़ाते हैं

3. अपर्याप्त प्रसंस्करण अवसंरचना

हालाँकि कई शहरों में कम्पोस्टिंग, MRF और WtE संयंत्र बने हैं, लेकिन:

  • 30% से कम अपशिष्ट का ही वैज्ञानिक उपचार हो पाता है
  • खराब इनपुट गुणवत्ता के कारण संयंत्र बंद हो जाते हैं

4. ULBs की सीमित वित्तीय और तकनीकी क्षमता

छोटी नगरपालिकाएँ पुराने उपकरणों, अस्थायी ठेकों और सीमित मानव संसाधन पर निर्भर हैं। उपयोगकर्ता शुल्क अपशिष्ट प्रबंधन लागत का बहुत छोटा हिस्सा ही कवर कर पाता है।

5. EPR का कमजोर कार्यान्वयन

  • कागज़ी अनुपालन
  • फर्जी रीसाइक्लिंग प्रमाणपत्र
  • बहुस्तरीय प्लास्टिक के लिये प्रभावी वापसी तंत्र का अभाव

6. अनौपचारिक क्षेत्र का अपर्याप्त एकीकरण

भारत में प्लास्टिक संग्रहण का लगभग 80% कार्य अनौपचारिक श्रमिक करते हैं। इसके बावजूद:

  • सामाजिक सुरक्षा नहीं
  • औपचारिक ठेकों में उपेक्षा
  • शोषण और अक्षमता

7. डेटा, निगरानी और जवाबदेही की कमी

2024 तक भारत के दैनिक अपशिष्ट का लगभग 22% या तो ट्रैक नहीं हो पाता या पर्यावरण में रिस जाता है।

8. नागरिक व्यवहार और उदासीनता

कई नागरिक अब भी अपशिष्ट को केवल नगरपालिका की जिम्मेदारी मानते हैं, जिससे पृथक्करण और शुल्क भुगतान में प्रतिरोध दिखता है।

अपशिष्ट कुप्रबंधन के व्यापक परिणाम

पर्यावरणीय प्रभाव

  • वायु, जल और मृदा प्रदूषण
  • प्लास्टिक द्वारा जैव विविधता को क्षति

जलवायु परिवर्तन में योगदान

  • 2018 में कुल GHG उत्सर्जन का लगभग 4%
  • मीथेन और ब्लैक कार्बन उत्सर्जन

सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिम

  • डेंगू, मलेरिया, हैजा जैसी बीमारियाँ
  • सफाईकर्मियों के लिये उच्च जोखिम

शहरी बाढ़ और अवसंरचना विफलता

  • नालियों का अवरोध
  • मानसून में बार-बार बाढ़

आर्थिक और सामाजिक लागत

  • स्वास्थ्य व्यय में वृद्धि
  • उत्पादकता हानि
  • संपत्ति मूल्यों में गिरावट

सुधार के लिये आवश्यक रणनीतियाँ

1. सख्त नीति प्रवर्तन और जवाबदेही

2. चक्रीय अर्थव्यवस्था की ओर संक्रमण

उत्पादन → उपभोग → पृथक्करण → पुन: उपयोग / रीसाइक्लिंग → न्यूनतम लैंडफिल

3. प्रौद्योगिकी और नवाचार

4. सुदृढ़ EPR और बाज़ार विकास

5. अनौपचारिक क्षेत्र का औपचारिकीकरण

6. वित्तपोषण और क्षमता निर्माण (इंदौर मॉडल)

7. दीर्घकालिक व्यवहार परिवर्तन

निष्कर्ष

भारत के लिये अपशिष्ट प्रबंधन केवल स्वच्छता का प्रश्न नहीं, बल्कि जलवायु कार्रवाई, सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा और संसाधन दक्षता का आधार है। यदि भारत रैखिक मॉडल से बाहर निकलकर चक्रीय अर्थव्यवस्था को अपनाता है, तो वह SDG 6, 11, 12 और 13 के साथ-साथ विकसित भारत @2047 के लक्ष्य को भी साकार कर सकता है।